सैनी को-आपरेटिव थ्रिफ्ट एण्ड क्रेडिट सोसायटी लि. की स्थापना वर्ष 1959 में दरियागंज के कुछ युवाओं की दूरदर्शिता का परिणाम है। वर्ष 1959 में दरियागंज के कुछ युवाओं के मन में एक विचार आया कि किस प्रकार अपने सैनी समाज के आर्थिक उत्थान के लिए कार्य किया जा सकता है। उस समय सैनी समाज में आर्थिक संपन्नता अधिक नहीं थी तथा समाज के अधिकतर लोग कृषि व्यवस्था पर ही निर्भर थे। उस समय खाद,बीज जैसी आवश्यक वस्तुओं की खरीद के लिए सभी के पास पर्याप्त धनराशि उपलब्ध नहीं हो पाती थी। उस समय लोग सामान्यत: इस कार्य के लिए महाजन से ऋण लेकर अपना कार्य पूर्ण करते थे।
वर्ष 1959 में कृषि के साधन इतने उन्नत नहीं थे जितने आज हैं। उस समय समाज के लोग अपना ऋण महाजन को निर्धारित अवधि में चुकता न कर पाने के कारण महाजन के चंगुल में फस जाते थे और अपनी ही भूमि पर मजदूर बन जाते थे।
दरियागंज सैनी समाज के कुछ लोग जिनमें श्री हरिराम सैनी, श्री बलबीर सिंह सैनी, श्री सुख राम वर्मा, श्री बनवारी लाल, श्री श्याम लाल, जय भगवान सैनी, श्री देवी दत्त नकुल, श्री ओमप्रकाश भारल, श्री सुलेख चन्द, श्री पुखराज, श्री करतार सिंह, श्री बाल मुकुंद, श्री सुखदेव सिंह, श्री बाल सिंह, श्री प्रताप सिंह, श्री करण सिंह, श्री नानक चन्द, श्री शेर सिंह, श्री छौटे लाल आदि सम्मिलित थे, ये लोग जब भी आपस में बैठते तो इस विषय पर अवश्य चर्चा करते कि सैनी समाज को कैसे महाजनों के चंगुल से बचाया जाए।
समाज में आर्थिक संपन्नता स्थापित करने का विचार तो अंकुरित हो चुका था किंतु कोई दिशा निर्धारित नहीं हो पा रही थी। एक दिन शाम को कुछ लोग चाय पीने के लिए आपस में बैठे थे और उनके मन में एक विचार आया कि क्यों न एक बचत एवं उधार सोसायटी बनाई जाए। समाज के लिए कुछ करने का विचार तो उनके मन में काफी समय से चल रहा था किंतु इस विचार से एक दिशा निर्धारित हुई और समाज में धीरे-धीरे अनेक लोगों ने इस विचार का मंथन किया कि क्या इसको साकार किया जा सकता है।
कहा जाता है जहां चाह वहां राह। परिणाम यह रहा है कि बीज जो अंकुरित हो रहा था वह सैनी को-ऑपरेटिव थ्रिफ्ट एण्ड क्रेडिट सोसायटी लि. के रूप में हमारे सामने आया। शुरू में इस सोसायटी के पास केवल अल्प पूंजी ही थी किंतु कारंवा बढता गया और लोग जुडते चले गए।
सोसायटी के शुरूआती समय में इसका कार्यक्षेत्र केवल दरियागंज और उसके नजदीक के क्षेत्रों तक ही सीमित था। इसका मुख्य कारण यह था कि उस समय इस सोसायटी के पास जितनी पूंजी उपलब्ध थी वह संपूर्ण समाज के लिए पर्याप्त नहीं थी इसलिए उस समय इसका विकास चाहकर भी नहीं किया जा सका था।
सोसायटी के संस्थापक सदस्य तो चाहते थे कि संपूर्ण समाज इससे लाभान्वित हो किंतु वित्तीय उपलब्धता एवं आर्थिक प्रबंधन इस विचार को आगे बढने से रोक रहे थे। धीरे-धीरे समाज में इस सोसायटी की चर्चा होने लगी और लोग इससे जुडने लगे। वर्ष 1980 के बाद इस सोसायटी की सदस्यता बहुत तेजी से बढी। आज इस सोसायटी के लगभग 16200 सदस्य हैं। यह वह सीमा थी जो मांग और पूर्ति के सिद्धांत के विरूद्ध थी वाबजूद इसके समाज के उत्थान को ध्यान रखते हुए सोसायटी ने अपनी सदस्यता जारी रखी।